स्वप्न सुन्दर बुन बटोही, राह तू जिस पर चले,
हर कदम की धमक सुन, हमराह ईश्वर भी बने l
'बोष' जैसा ओज चमके, राष्ट्र हित में हो सफ़र,
या विवेकानंद बन जा, गर्व मय कर दे डगर,
पग बढ़ा उस मग में जिसका जग भी अनुयायी बने l
दम्भ रावण का हता, 'बनवासी' बनकर राम ने,
एक महाभारत रचा था , 'सारथी' बन कृष्ण ने,
त्याग वैभव का नगर, सिद्धार्थ गौतम बुद्ध बने,
तन तपाया मन तपाया, और वे ईश्वर बने l
राष्ट्र की सेवा का किंचित ही तुम्हारा भाव हो,
प्रथम त्यागो द्वेष और मन में सरस सद्भाव लो,
जन जगा गाँधी बनो वे पतित पावन थे बने l
No comments:
Post a Comment