Wednesday, 10 April 2013

अपने उस गावं को मै भुला न सका...


अर्थ के मोह में भागता ही रहा, ब्यर्थ भौतिक सुखों में उलझता रहा।
सोचता तो रहा पर समझ न सका, अपने उस गावं को मै भुला न सका।

कितनी मीठी कसक गावं की याद में, आम के बाग में, पास के खेत में l
चहचहाना  खगों का का मधुर साज में, गुनगुनाते वो भौरे हर कली डाल में l
क्या भुला पाऊंगा निष्कपट प्यार को, उस कुमुदनी के इठलाते अंदाज को l
जब भी पोखर के कीचड में खुलकर खिले, आसमा पर सितारों सी धरती सजे l
उन सभी को अभी तक भुला न सका, अपने उस ...


थी अभावों भरी वो भले ही डगर, सारे मौलिक सुखों से भरी थी मगर  l
न तो घड़ियों की टिक -टिक की आवाज थी, न तो बंगले में गुर्राती ये कार थी,
न तो कानो में धसते हुए हार्न थे, न धुएं से भरे खेत खलिहान थे,
बांस के चाप से लक्ष्य को भेदते, गाँव का बचपना  धुल में खेलते,
वो कबड्डी की लय में युवक कूदते, खेत सरसों भरे पीत हो फूलते,
आसमां भी जहाँ था क्षितिज चूमता, अपने उस ......l  


था मयूरों का मोहक वहां नाचना, दादुरों का सदा लय में टर टर सुना,
वो माटी की खुशबू  की क्या बात थी, वहां कोयल की मीठी सी आवाज थी,
क्या भुला पाउँगा घुन्घुन्रुओं को कभी, संग बैलों के घुन घुन थे सुनते सभी,
वो नानी, वो दादी की किवदंतियां, वीर रस से भरी थी सभी पंक्तियाँ,
जहाँ विश्राम करता था राही थका, अपने उस .....l


आह! अब वो सुनहले कहाँ गाँव है? नीम, पीपल व बट की कहाँ छाँव है ?
अब तो कीकर के काँटों भरी वो डगर, छाँव तो लापता है 'यूकेलिप्टस ' मगर l
अब न पशुओं की हेली चारागाह है, अब न बहती नदी दूध  की, छाछ है l
अब न पनघट पे दिखती हैं पनहारियाँ, सकुचाती महावर से अब नारियां l
आज माओं के  आँचल भी मुरझा गए, कौन वीरों की धरती धरा पर जने ?
प्रदूषित हैं नदियाँ, हर नगर, गाँव है, अब प्रदूषण भरे तीर्थ व धाम है l
जो स्वछंदता मै बचा न सका।  अपने उस गाव को मै भुला न सका।


05/12/2002  पूरननगर, उन्नाव। 


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