Monday, 1 April 2013

-तुमतो हमारे हो रचयिता -


           -तुमतो हमारे हो रचयिता -
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कदम रखता हूँ कहीं ,आभाष होती राह तेरी ,
तन हमारा है तो क्या ,मन में सदा है चाह तेरी l

पूंछता हूँ मैं विधि से यह तेरा है न्याय कैसा ?
तन से विलग मन को बसा ये रच दिया संसार कैसा ?
आह ! को कर अनसुना तूने जगत की नीव रख दी,
हर ह्रदय में प्यास भर संताप की क्यों राह रच दी ?
मै ही नहीं ,देवों को भी  प्यार में तूने रुलाया ;
राम-सीता ,कृष्ण-राधा  व उमा से शिव छुड़ाया l
इन सभी को दूर कर ,तूने रचा इतिहास ऐसा ,
सृजन तो बस दिख रहा था, उस घड़ी विध्वंस जैसा !
कर भला सो हो भला, यह सार भी तूने रचाया ,
फिर भला क्यों प्यार से प्यार को तूने छुड़ाया  l
हे विधाता ! कर भला, यह जग तुम्हारे पाँव पड़ता ,
है तुम्हारे हाँथ सब, तुमतो हमारे हो रचयिता ल


२४.१२.२००० (खोड़ा -नोएडा )

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